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जिंदगी की पहली जंग अस्पताल में जीता नन्हा योद्धा, 1.1 किलो से बढ़कर 1.5 किलो हुआ वजन

गुरुग्राम: जुड़वां बच्चों के जन्म की खुशी मनीषा के परिवार के लिए उस समय चिंता में बदल गई, जब उन्हें पता चला कि बेटे का वजन महज 1.1 किलो है। 34 सप्ताह में इमरजेंसी सिजेरियन डिलीवरी से जन्मे दोनों बच्चों में वजन का अंतर काफी था। बेटी का वजन करीब 2.4 किलो था, जबकि बेटा सिर्फ 1.1 किलो का। जन्म के कुछ ही समय बाद छोटे बच्चे को सांस लेने में परेशानी होने लगी और उसे विशेष नवजात देखभाल की जरूरत पड़ी।

अगले करीब 30 दिन परिवार के लिए इंतजार, चिंता और उम्मीद के रहे। नन्हे बच्चे को अस्पताल में लगातार निगरानी में रखा गया। उसकी सांस, दूध लेने की क्षमता, तापमान, वजन और शरीर में इलेक्ट्रोलाइट्स के संतुलन पर नियमित नजर रखी गई। इस दौरान उसका सबसे बड़ा लक्ष्य था—धीरे-धीरे स्थिर होना, दूध लेना शुरू करना और अपना वजन बढ़ाना।

1.1 किलो का वजन होने के कारण बच्चा बहुत कम जन्म वजन (Very Low Birth Weight) की श्रेणी में था। समय से पहले जन्म लेने वाले ऐसे बच्चों में सांस लेने में परेशानी, दूध पीने में दिक्कत, शरीर का तापमान बनाए रखने में समस्या, ब्लड शुगर और इलेक्ट्रोलाइट्स में असंतुलन तथा संक्रमण का खतरा अधिक रहता है। इसलिए शुरुआती दिन उसके लिए बेहद अहम थे।

सिल्वर स्ट्रीक मल्टी-स्पेशियलिटी हॉस्पिटल, गुरुग्राम की कंसल्टेंट, पीडियाट्रिक्स एवं नियोनेटोलॉजी डॉ. पूजा सिंह ने बताया कि बच्चे की हालत में सुधार अचानक नहीं, बल्कि धीरे-धीरे आया।

“1.1 किलो के प्रीमैच्योर बच्चे में हर दिन बहुत महत्वपूर्ण होता है। इस बच्चे को शुरुआत में सांस लेने में परेशानी थी, लेकिन सपोर्टिव केयर के साथ उसकी स्थिति धीरे-धीरे बेहतर हुई। हमने बच्चे को कम से कम संभालने, पर्याप्त पोषण और कंगारू मदर केयर पर विशेष ध्यान दिया। सबसे खुशी की बात यह रही कि उसका वजन लगातार बढ़ता रहा,” डॉ. सिंह ने कहा।

बच्चे के लिए मां का दूध सबसे अहम पोषण रहा। मां के निकाले हुए स्तन दूध को प्राथमिकता दी गई और जरूरी सप्लीमेंट्स भी दिए गए। मनीषा ने भी इलाज में पूरी तरह साथ दिया। वह रोजाना करीब 2 से 3 घंटे बच्चे को त्वचा से त्वचा का संपर्क देती रहीं। कंगारू मदर केयर के इस तरीके ने बच्चे को गर्माहट देने और मां-बच्चे के जुड़ाव को मजबूत करने में भी मदद की।

धीरे-धीरे स्थिति बदलने लगी। जो बच्चा जन्म के समय सिर्फ 1.1 किलो का था, उसका वजन बढ़कर 1.5 किलो हो गया। जीवन के 30वें दिन वह चिकित्सकीय रूप से स्थिर था और मां का दूध ले रहा था। उसकी न्यूरोलॉजिकल स्थिति भी संतोषजनक रही। इसके बाद डॉक्टरों ने परिवार को घर पर उसकी विशेष देखभाल के लिए जरूरी निर्देश देकर उसे छुट्टी दे दी।

डिस्चार्ज के समय परिवार को साफ तौर पर समझाया गया कि बच्चे की देखभाल अभी खत्म नहीं हुई है। उसके वजन और विकास की नियमित निगरानी, टीकाकरण, आंखों की जांच और न्यूरो-डेवलपमेंटल फॉलो-अप जरूरी होंगे। जन्म के समय हाइपोस्पेडियास की पहचान भी हुई थी, जिसके लिए आगे उचित समय पर पीडियाट्रिक सर्जिकल परामर्श की सलाह दी गई।

डॉ. सिंह ने कहा, “प्रीमैच्योर बच्चे का डिस्चार्ज होना परिवार के लिए बड़ी राहत जरूर है, लेकिन यह देखभाल के अगले चरण की शुरुआत है। घर पर सही फीडिंग, संक्रमण से बचाव और नियमित फॉलो-अप बहुत जरूरी हैं। अगर बच्चे को सांस लेने में परेशानी हो, वह दूध कम ले, बुखार आए या सामान्य से ज्यादा सुस्त दिखाई दे तो तुरंत डॉक्टर से संपर्क करना चाहिए।”

मनीषा के परिवार के लिए इस पूरी यात्रा में 400 ग्राम की बढ़ोतरी सिर्फ वजन बढ़ने का आंकड़ा नहीं थी। 1.1 किलो से 1.5 किलो तक का सफर उनके लिए उन 30 दिनों की हर छोटी जीत का नतीजा था, बेहतर सांस, थोड़ा ज्यादा दूध, बढ़ता वजन और आखिरकार मां की गोद में घर लौटने की खुशी।

करीब एक महीने तक अस्पताल की निगरानी में रहने के बाद जब नन्हा बच्चा घर के लिए निकला, तो परिवार के लिए सबसे बड़ी राहत यही थी कि जिस जिंदगी को लेकर शुरुआत में हर पल डर लगा रहा था, वह अब धीरे-धीरे अपने पैरों पर मजबूत होने की राह पर थी।

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